27. छात्र और राजनीति

 

यह सवाल आज काफी चर्चित हो चुका है कि छात्रों को सक्रिय राजनीति में भाग लेना चाहिए या नहीं ? वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर विचार करने पर यह साफ जाहिर होता है कि आज की राजनीति रचनात्मक पहलू का विकास करने में पूर्णतया असफल सिद्ध हो रही है। आज की राजनीति केवल आलोचना के संकुचित दायरे तक ही सिमटकर रह गई है। राजनैतिक कुचक्र के दलदल में फंसा हुआ राष्ट्र साँसे मुश्किल की ले रहा है  

जनसाधारण के मनोबल को भी विकसित करना नितांत आवश्यक है, क्योंकि यदि जनता आत्मनिर्भर नहीं होगी, उसमें नैतिक साहस का विकास नहीं हो सकेगा। आज व्यावहारिकता से परे संकीर्ण मनोवृत्तियों की राजनीति बढ़ने लगी है

ऐसी राजनीति में छात्रों का सक्रिय भाग लेना सर्वथा अनुचित ही समझा जाना चाहिए, क्योंकि छात्रावस्था में विद्यार्जन के लिए जिस कड़ी तपस्या की आवश्यकता होती है, उसमें इससे भारी व्यवधान उपस्थित होता है और छात्रों के भावी जीवन में जिस नैतिकता और स्वस्थ नागरिकता की अपेक्षा की जाती है, वह मात्र अपेक्षा ही रह जाती है  

अगर हम कहें कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय हिस्सा नहीं लेना चाहिए, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक गतिविधियों के प्रति वे सर्वथा उदासीन हां

उन्हें तो विश्व में घटित होने वाली राजनीतिक घटनाओं की क्रिया तथा प्रतिक्रिया का सम्यक् अध्ययन होना ही चाहिए इसके साथ ही अपने देश में प्रचलित राजनीतिक दलों की गतिविधियों तथा उससे उत्पन्न परिस्थितियों का भी सम्यक बोध होना नितांत आवश्यक है। 

आज के छात्र ही कल के नागरिक होंगे, उन्हीं के कंधों पर राष्ट्र का बोझ आएगा; अत: उन्हें भविष्य में उपयुक्त नागरिक बनने के लिए राजनीतिक गतिविधियों का सम्यक् ज्ञान अपेक्षित है, क्योंकि इस ज्ञान के माध्यम से ही वे देश के भाग्य तथा भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं।

जब छात्र अपनी बुद्धि की परिपक्वावस्था में पहुँच जाएँ तो ऐसी हालत में वह स्वयं इसका निर्णय कर सकते हैं कि राजनीति में सक्रिय हिस्सा लेना उनके लिए हितकर है या अहितकर

 

28. शरद ऋतु

 

शरद ऋतु क्वार से कार्तिक तक रहती है। अंग्रेजी महीनों के अनुसार यह ऋतु जाड़े की ऋतु कहलाती है। यह नवम्बर में प्रारम्भ हो जाती है और दिसम्बर तथा मध्य जनवरी तक रहती है। इंगलैंड में यह Winter season कहलाती है और वहाँ अगस्त में ही शुरू हो जाती है और जुलाई में समाप्त होती है शरद ऋतु में जाड़ा पड़ता है। शरीर का तापक्रम 37°C है। जाड़े में बाह्य तापक्रम 4°C से 20°C तक हो जाता है। अतः मनुष्य को जाड़ा लगता है।

जाड़े में ही भारतवर्ष में दलहन, तंलहन की फसलें होती हैं। जाड़े की ऋतु सम्पन्नों के लिए आनन्द की होती है। वे गर्म कपड़े पहनकर उष्मा का नुभव करते हैं। वे हीटर एवं रूम वार्मर चलाकर गर्मी का अनुभव कर लेते हैं।

जाड़े का मौसम गरीबों के लिए कष्टकर होता है। वे पुआल बिछाकर सोते हैं। वे रजाई ओढ़ते हैं। वे लकड़ी-गोइठा सुलगा कर आग तापते हैं। भारतवर्ष गरीब देश है।

भारतवर्ष के लिए गर्मी ही अनुकूल पड़ती है जाड़े में सभी काँपने लगते हैं। जाड़े में शरीर ठंडा होने लगता है। स्नान करने में ठंढक लगती है। गर्मी नहीं रहने से प्रसन्नता की कमी हो जाती है। स्वास्थ्य भी गड़बड़ होने लगता है। ढंठक लगने से बूढ़े लोग स्वर्ग जाने की तैयारी करने लगते हैं।

हृदय बैठ जाता है। लकवा मार देता हैं। जीवन के लाले पड़ जाते हैं। यह एक कठिन मौसम है। यह एक जटिल मौसम है। हाँ, जाड़े के बाद वसंत ऋतु का शुभागमन हो जाता है। सभी पुनः प्रसन्न हो जाते हैं।