निबंध -परोपकार| जल-संकट | BIHAR BOARD 2020 |
25. परोपकार
हिंदी के राष्ट्र कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है कि "वही मनुष्य हैं कि जो मनुष्य के लिए मरे।” गुप्तजी ने वस्तुतः इस पंक्ति में सहज स्वाभाविक ढंग से मनुष्यता को परिभाषित कर दिया है । इस परिभाषा के अनुसार वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी है जो मानव जाति की सेवा को परम धर्म एवं सर्वोपरि मानता है। उसमें स्वार्थ की भावना नहीं होती। स्वार्थी मनुष्य तो पशु के समान होता है। इसलिए परोपकार में ही जीवन की सार्थकता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है कि "परहित सरिस धर्म नहीं भाई ", अर्थात् परोपकार के समान कोई दूसरा धर्म नहीं है । कहने का तात्पर्य यह कि 'स्व' और 'पर' का भद हो माया है ।
'स्व'
की संकुचित सीमा से निकलकर 'पर'
का भेद ही माया है
। 'स्व' की संकुचित सीमा
से निकलकर 'पर' के लिए अपने
आप को बलिदान कर
देना ही सच्ची मानवता
है । यही सबसे
बड़ा गुण है और यही
मनुष्य का सबसे बड़ा
धर्म है। इसलिए आत्मा की शांति तथा
स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति के
लिए परोपकार परम आवश्यक है ।
मनुष्य
एक सामाजिक प्राणी है। समाज ही उसका कर्मक्षेत्र
है, अत: उसे स्वयं को समाज के
लिए उपयोगी बनाना आवश्यक है । मनुष्य
की उपयोगिता भी इसी में
है कि वह परहित
के लिए अपना सर्वस्य समर्पण के लिए तत्पर
रहे। वास्तव में परोपकार और सहानुभूति पर
ही
समाज स्थापित होता है। इसलिए परोपकार का जीवन में
बड़ा ही महत्त्व है।
यह आत्मिक शुद्धता का सोपान है,
चरित्र को महान् बनाने
वाली सबसे बड़ी शक्ति है। व्यक्तित्व ही महानता का
द्योतक है।
26. जल-संकट
आनेवाले समय में जल-संकट संसार के लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर आएगा। राष्ट्र-राष्ट्र के बीच पानी के बँटवारे के लिए तलवारें खिंच जाएँगी । लोग पीने के पानी के लिए तरस जाएँगे, छटपटाने लगेंगे । शुद्ध पेय जल का संकट तो पहले से ही है। सिंचाई के लिए जल का अभाव तो पहले से ही है जल-संकट से बचने के लिए हमें उपलब्ध जल बरबाद नहीं करना होगा । उसे एकत्रित कर सुरक्षित रखना होगा। वर्षा-जल का एकत्रीकरण करना होगा ।
बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर पानी एकत्र करना होगा । गिरते भूगर्भ जल-स्तर को स्थिर करना होगा । तभी पीने के लिए पर्याप्त पानी मिलता रहेगा। सिंचाई के लिए वर्षा-जल का भंडारण करना होगा ।
बड़े-बड़े चौखुटा गड्ढे खोदकर जल का भंडारण करना होगा । नदियों का जल सिंचाई के लिए प्रयोग में लाना होगा । अन्यथा पानी के लिए खेत तरस जाएँगे। खेती सूखाग्रस्त हो जाएगी पशु-पक्षी पीने के लिए जंगल, गाँव-गाँव, बगीचे-बगीचे घूमते पाए जाएँगे ।
'रहिमन पानी राखिए' की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी । पहले पीने का पानी तब इज्जत का पानी । जल प्रदूषण से भी मुक्ति के लिए कोशिशें तेज करनी होंगी । नदियों के जल को प्रदूषण से बचाना होगा ।
गंगा-यमुना
के पानी को शुद्ध करना
होगा । जल-संकट
से बचने के लिए प्रयास
तेज करने होंगे । सरकारें अन्न
कोश बनाने में फंसी हैं। उन्हें जल-कोश का
भी निर्माण करना होगा ।
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