लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर गद्य भाग Bihar Board 2020 exam
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
गद्य भाग
1. 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' शीर्षक व्यंग्य
रचना का सारांश लिखिए।
उत्तर 'ठिठुरता
हुआ गणतंत्र' शीर्षक परसाईजी की एक व्यंग्य रचना है। इसमें देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था
पर व्यंग्य किया गया है । कहा जाता है देश विकास कर रहा है, जबकि देखने को मिलते हैं
काले कारनामे ।
स्वतंत्रता
दिवस पर होने वाली बरसात मौसम की बरसात पर व्यंग्यकार कहता है स्वतंत्रता दिवस भी तो
बरसात में होता है । अँग्रेज बहुत चालाक हैं। भर बरसात में स्वतंत्र , तो उसे प्रेमी की नहीं छाता-चोर की याद सताती है। स्वतंत्रता दिवस भींगता है और
गणतंत्र दिवस ठिठुरता है ।' गणतंत्र दिवस पर झाँकियाँ निकलती हैं। ये झाँकियाँ झूठ
बोलती हैं। इनमें विकास कार्य, जन-जीवन, इतिहास इत्यादि रहते हैं। हर वर्ष घोषणा होती
है समाजवाद आ रहा है। लेकिन यह सत्य नहीं है। साठ वर्ष आजादी के होने जा रहे हैं। समाजवाद
अभी तक नहीं आया।
व्यंग्यकार
एक सपना देखता है। समाजवाद आ गया है बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है। अब प्रश्न यह है
कि कौन इसे पकड़कर लाएगा-समाजवादी या पूँजीवादी, संसोपा प्रसोपावाले या कम्युनिस्ट।
कांग्रेसी समाजवाद लाएँगे या सोशलिस्ट/ इसी में समाजवाद अटका हुआ है। निष्कर्षत: भारत
का गणतंत्र (26 जनवरी) ठिठुरता हुआ आता है। बड़ी ही कौतूहलवर्द्धक यह रचना बन पड़ी
है-
दूसरी तरफ जुम्मन के अपने तर्क थे "बुढ़िया न जाने कब तक जियेगी। दो-तीन बीधे ऊसर क्या दे दिया, मानो मोल ले लिया। बघारी दाल के बिना रोटियाँ नहीं उतरतीं। अलगू पंच बनाए गए। बूढ़ी खाला ने कहा- 'बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?' बूढ़ी खाला पंचायत से कहती है-'मुझे न पेट की रोटी मिलती है, न तन का कपड़ा। बेकस बेवा हूँ। कचहरी-दरबार नहीं कर सकती। तुम्हारे सिवा और किसको अपना दुःख सुनाऊँ? तुम लोग जो राह निकाल दो उसी पर चलँ ।'
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