निबंध - वर्षा ऋतु | दीपावली | BIHAR BOARD 2020 |
वर्षा ऋतु
ग्रीष्प-रूपी दैत्य के अतिशय अत्याचार से पृथ्वी तवे की तरह जलने लगती है। जेठ माह की दोपहरी में छाँह भी छाँह चाहती है मानव तो आकुल-व्याकुल होते ही हैं, पक्षियों का हृदय भी विदीर्ण होने लगता है। कृषक समाज पर उदासी का आलम व्याप्त रहता है। ग्रामबालाओं के अनुनय-विनय से प्रभावित होकर देवराज इंद्र मेघ भेजते हैं । मध्य जेठ में मतवाले बादल नभ में गर्जन का नगाड़ा ठोकते हुए दौड़ पड़ते हैं।
प्यासी धरती पर अमृत की बूंदें झरने लगती हैं । मानव, पशु, पक्षी, पेड़ -पौधे सबों में नवजीवन का संचार होता है। सामान्यत: आषाढ़ के आरंभ से ही वर्षा की फुहार दिखाई पड़ती है, और आश्विन माह तक धौले बादलों की घुड़-दौड़ होती रहती है परंतु, वर्षा ऋतु की मस्तानी चाल सावन-भादों में देखते ही बनती है ।
फिर भी जून से सितंबर महीने तक की अवधि वर्षा ऋतु में परिगणित की जाती है। सभी जीव-जंतु, पशु-पक्षी, पेड़ -पौधे, वर्षा ऋतु का स्वागत करते हैं । शीघ्र ही पृथ्वी अपनी हरी चादर बिछा देती है। नदियाँ लहरा उठती हैं और तटबंधों को तोड़कर विस्तृत क्षेत्र में फैलने के लिए व्याकुल हो उठती हैं। उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देख कर केवल मोर ही नहीं नाचते, अपितु बच्चों की टोलियाँ भी अपनी प्रसन्नता झमाझम वर्षा में चहक-चहककर स्नान करने में व्यक्त करती हैं । वर्षा को ऋतुओं की रानी कहा गया है।
इस ऋतु में
प्रकृति रानी पल-पल में
परिधान परिवर्तित कर अपनी अद्भुत
छटा दिखाने लगत है। दादुर की ध्वनि तथा
झींगुर की झंकार एक
संगीतमय वातावरण उपस्थित करती हैं। घनघोर वर्षा किसानों तथा गरीबों के लिए संकट
उत्पन्न करती है। अतिवृष्टि से छोटी-छोटी
सड़कें सर्पिल नाले का रूप ले
लेती हैं । यातायात अवरुद्ध
हो जाता है। अतिवृष्टि से बाढ़ का
दानवी रूप प्रकट होता है। धन-जन का
नाश होता है। खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती हैं
और किसानों पर विपत्ति के
पहाड़ टूट पड़ते हैं ।
20. दीपावली
मनुष्य के जीवन में सामान्य और विशेष दो प्रकार के कार्य होते हैं। सामान्य कार्य और सामान्य दिन बराबर होते हैं, किंतु विशेष कार्य और विशेष दिन अपने नियत समय पर आते हैं और उनका विशेष महत्त्व होता है। भारतवर्ष एक ऐसा देश है जहाँ प्राचीनकाल से वर्णाश्रम व्यवस्था चली आ रही है।
मूलतः भारतीय समाज चार वर्षों में विभाजित है । प्रत्येक
वर्ण का अपना-अपना
त्योहार होता है । उन
त्योहारों का भारतीय समाज
में बड़ा महत्व है। यह त्योहार मनाने
की प्रथा मानव-समाज में अज्ञातकाल से चली आ
रही है। भारत में चार त्योहार मुख्य रूप से मनाये जाते
रहे हैं-रक्षाबंधन, विजयादशमी, दीपावली और होली ।
इसलिए दीपावली के एक दिन पहले नरक-चौदस होती है और इस दिन घरों का कूड़ा-करकट सब फेंककर उनकी लिपाई-पुताई करते हैं । दीपावली के दिन सबके घर लिपे-पुते, साफ-सुथरे दिखाई पड़ने लगते हैं। यह भी कहा जाता है कि इसी तिथि को महाराजा रामचंद्र ने लंका विजय करके अयोध्या में पदार्पण किया था ।
उनके आगमन के उपलक्ष्य में उस समय अयोध्या नगर में दीपमालिका मनायी गयी । उसी घटना की स्मृति में आज भी दीपावली मनायी जाती है कतिपय किसान कुछ थोड़ा-बहुत व्यवसाय भी करते हैं। इस त्योहार को मनाकर सभी अपने कार्य में लग जाते हैं। प्राचीन काल में भारत में प्रकृति-पूजा की परिपाटी अधिक थी ।
लक्ष्मीजी संपत्ति
की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती थी। अत: उनकी पूजा उत्साह से की जाती
थी । अब भी
व्यवसायी वर्ग लक्ष्मी पूजन उत्साह से करता है
। वर्षा की नयी तथा
विभिन्न प्रकार की गंदगियाँ साफ
कर दी जाती हैं
और समाज नयी स्फूर्ति से काम प्रारंभ
करता है । दीपावली
हिंदू संस्कृति का सोल्लासपूर्ण त्योहार
है।
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