निबंध

                                2. बेरोजगारी की समस्या

सभी व्यक्ति अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं । यदि लोगों को कार्य की योग्यता एवं काम की अभिलाषा रखने के बावजूद काम नहीं मिलता तो उस अवस्था को बेरोजगारी कहते हैं। बेरोजगारी के संकेत हमें सोलहवीं


शताब्दी से ही मिलने लगते हैं । कविवर तुलसीदास ने तत्कालीन समाज का चित्रण करते हुए कवितावली में लिखा है जीविका-विहीन लोग सीधमान, सोचबस, कहै एक एकन सों, कहाँ जाइ, का करी ?"


खेती न किसान, भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज न चाकर को चाकरी ।


भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी उन्नीसवीं शताब्दी में शिक्षित बेरोजगारों की स्थिति को स्पष्ट करते हुए लिखा है


तीन बुलाए, तेरह आवै, निज-निज विपदा रोई सुनावै । आँखों फूटे, भरा न पेट, क्यों सखी सज्जन, नहि ग्रेजुएट ।


लेकिन 21वीं शताब्दी में बेरोजगारी एक विकराल समस्या के रूप में उभरकर सामने आयी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1990-2000 के बीच में भारत में शिक्षित बेरोजगारों


की


संख्या 50 लाख के करीब थी, जो उत्तरोत्तर बढ़ ही रही है । अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में मुख्य रूप से तीन प्रकार की बेरोजगारी पायी जाती है


(I) अप्रत्यक्ष बेरोजगारी जब किसी काम में आवश्यकता से अधिक आदमी लगे होते हैं और कुछ लोगों को उस काम से हटा दिए जाने पर भी उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं


पड़ता तब उसे अप्रत्यक्ष बेरोजगारी कही जाती है। (ii) मौसमी बेरोजगारी कुछ व्यक्तियों को वर्ष में कुछ महीनों के लिए ही काम मिल पाता है। बाकी समय वे खाली बैठकर बिताते हैं क्योंकि उनका काम मौसम के अनुरूप चलता है। ऐसी बेरोजगारी मौसमी बेरोजगारी कहलाती है।


(iii) ढाँचागत बेरोजगारी यदि किसी अर्थव्यवस्था में सभी मजदूरों को नौकरी देने के लिए पूँजी अथवा साधन उपलब्ध नहीं हो तो ऐसी दशा को ढाँचागत बेरोजगारी की संज्ञा दी जाती है ।