निबंध - नोटबंदी क्यों? | कालाधन | विज्ञान : वरदान या अभिशाप | BIHAR BOARD 2020 |
नोटबंदी क्यों?
भारत सरकार ने 8 नवम्बर, 2016 को घोषणा की कि मध्यरात्रि के बाद ऐसे नोट अब विधि ग्राह्य मुद्रा नहीं रहे हैं जो 500 एवं 1000 के हैं। इसके स्थान पर 2000 और 500 के नए नोट प्रचलन में आएंगे। 9 नवम्बर, 2016 जिस दिन से उच्च मूल्य वाले नोट विमुद्रीकृत किए गए थे, को सभी बैंक बंद रखे गए थे। यह व्यवस्था की गयी थी कि रद्द किए गए उच्च मूल्य के यह करेंसी नोट 500 एवं 1000 के नोट सभी बैंकों, रिजर्व बैंक के निर्गम कार्यालयों व डाकघरों में बैंक खातों में 30 दिसम्बर, 2016 तक जमा किए जा सकते हैं। नोटबंदी, वह भी 1000 और 500 के नोटों का एक बड़ा काम था भारत की अर्थव्यवस्था में सुधार लाना था। बिना टैक्स दिए धन एकत्रीकरण, भंडारीकरण का नाम था काला धन। एक तरफ बढ़ती जनसंख्या का भार, दूसरी तरफ विकास का काम, तीसरी तरफ बेरोजगार नवयुवकों को रोजगार देने का काम ये सभी काम तो पूरे करने ही थे। हाल की नोटबंदी से हानि भी कम नहीं हुई है। लोगों को बैंकों के बाहर खड़ा होना पड़ा। कुछ भीड़ की धक्का-धुक्की में मर भी गए। सभी को समझाना था कि इस कदम से देश के गरीबों, व्यापारियों और बेरोजगारों का उद्धार ही होगा। लेकिन नेता यह समझने को तैयार नहीं थे। अर्थशास्त्री तैयार थे। यह एक आवश्यक कदम है, अगर भारत को मजबूत बनाना है। इससे होनेवाली हानि को याद नहीं रखना है। यह भारत के कल्याण के लिए कष्टकर परतु सुखकर कदम था। नोटबंदी भारत के लिए एक लाभदायक कदम है। इसका समर्थन सभी को करना चाहिए। इसका लाभ जब जनता को पहुँचेगा, तब लोगों को समझ में आएगा। अभी तो कालेधन से अर्जित सम्पत्ति, भवन की जब्ती होने पर और खुलासा होगा। जब ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डर है?
कालाधन
भारतवर्ष में कालाधन एक विकराल समस्या के रूप में सामने आया है। इससे आर्थिक विषमता बढ़ी है। धनवान और धनवान हो गए हैं। गरीब और गरीब होते जा रहे हैं। भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की तूती बोलती रही। पूँजीपतियों और उद्योगपतियों का धन-भंडार बढ़ता जा रहा है। भारत में 30 लाख करोड़ का कालाधन है। कालाधन वह धन है जो बिना सरकार को टैक्स दिए पूँजीपतियों, राजनीतिज्ञों, अफसरों के पास इकट्टा हो जाता है। यह एक प्रकार की बेईमानी है। लिखित आमदनी वाले लोग तो टैक्स जमा करते हैं लेकिन अलिखित आमदनी वाले टैक्स चुरा ले जाकर अपनी झोली भरते रहते हैं। आतंकवादी, तस्कर, नक्सली एवं नशा व्यापारी भी इस कालेधन का उपयोग करते हैं। भ्रष्टाचार से आया धन, विचौलिए का काम करने पर आया धन, भू क्रय-विक्रय से आया कालाधन इसके अन्तर्गत आता है। अर्थव्यवस्था सरकारी अर्थव्यवस्था के समानान्तर चलने लगती है। बड़े-बड़े कल-कारखाने टैक्स न देकर कालाधन जमा करते हैं। सिनेमा वाले भी खूब कालाधन जमा कर रहे हैं। राजनीतिज्ञ तो सत्ता के मद में कालाधन जमा कर रहे हैं। वे कभी पशुपालन घोटाला तो कभी शराब बन्दी शराब खुली घोटाला कर रहे हैं। नेता जितना ही प्रभावशाली और बाहुबली हुआ। वह उतना की अधिक कालाधन कमाता है। आतंकवादी भी हवाला-डील करते रहते हैं। स्विट्जरलैंड के बैंक में दुनिया भर का कालाधन जमा है। भारतीयों ने भी यहाँ धन जमा कर रखा है।
विज्ञान : वरदान या अभिशाप
ज्ञान की नियोजित पद्धति का नाम ही विज्ञान है । यह यकीनन अंधकार पर प्रकाश की, अज्ञान पर ज्ञान की, शक्ति पर बुद्धि की विजय का नाम है। इसने सपनों की रंगीन दुनिया को सच कर दिया है । वैज्ञानिक आविष्कारों के पहले हम पौराणिक कथाओं में देवदूतों, परियों और इंद्रजाल के करतबों की कहानी सुना करते थे । चाँद और सितारों पर सैर करने के काल्पनिक आनंद में खोए रहते थे, तिलस्मी और ऐय्यारी उपन्यासों के माध्यम से मनुष्य की सामर्थ्य की दुनिया से बाहर जाकर अपनी काल्पनिक शक्ति पर भरोसा करते थे, पर विज्ञान ने इस झूठा आनंद, झूठी खुशी को वास्तविक खुशी और आनंद में बदल दिया है । विज्ञान की प्रभुता से आज का आदमी जो खाता है, जो पहनता है, जो पढ़ता है, जिस पर लिखता है और जिससे लिखता है, वे सभी विज्ञान की ही देन हैं । प्रकृति ने हमें बाधाएँ दी हैं, पर विज्ञान ने उन बाधाओं को लाघने का रास्ता दिया है। यह विज्ञान का चमत्कार ही है कि हम लहरों से खेल सकते हैं, तूफानों से लड़ सकते हैं और उमड़ते हुए समुद्र को पार करने में सफल होते हैं। इसकी वजह से हम भाग्यवाद और नियतिवाद को चुनौती दे सकने में समर्थ हो सके हैं। पौराणिक कथाओं का रहस्यमय आश्चर्य आज विज्ञान के करिश्मों के सामने लज्जित हो गया । निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि विज्ञान बुद्धि द्वारा उत्पादित अपरिमित शक्ति, सुविधा और विनाश का नाम है । पर हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि शक्ति का उद्देश्य प्रतिरक्षात्मक होना चाहिए, न कि आक्रामक । कोई भी ज्ञान मानवता के लिए वरेण्य हैं, न कि विनाश के लिए । विज्ञान फूल भी है, काँटा भी। हमें आवश्यकता के अनुरूप उसका इस्तेमाल करना होगा । विज्ञान का उद्देश्यहीन उपयोग अँधेरी गलियों में भटका सकता है, कुछ हासिल नहीं करा सकता । दिनकर ने ठीक ही कहा है
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